परिचय
महर्षि विश्वामित्र का अयोध्या आगमन और श्रीराम एवं लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए ले जाने की घटना रामायण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। यह वह क्षण था जब भगवान श्रीराम अपने राजमहल से बाहर आकर अपने दिव्य कर्तव्यों की पूर्ति के लिए पहला कदम बढ़ाते हैं।
महर्षि विश्वामित्र का अयोध्या आगमन
एक दिन, महान तपस्वी महर्षि विश्वामित्र अयोध्या के राजदरबार में आए। वे एक तेजस्वी और ज्ञानवान ऋषि थे, जो कठोर तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने राजा दशरथ को बताया कि उनके यज्ञ को राक्षसों—विशेषकर मारीच और सुबाहु—द्वारा बार-बार बाधित किया जा रहा है। ये राक्षस अपने मायावी शक्ति से यज्ञ का विध्वंस कर रहे थे।
राम को भेजने का अनुरोध
महर्षि विश्वामित्र ने राजा दशरथ से उनके ज्येष्ठ पुत्र राम और उनके अनुज लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए भेजने की प्रार्थना की। उन्होंने आश्वासन दिया कि राम, यद्यपि किशोर हैं, फिर भी उनमें इतनी शक्ति है कि वे राक्षसों को पराजित कर सकते हैं। राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र को इस कठिन कार्य के लिए भेजने में पहले तो संकोच कर रहे थे।
महर्षि वशिष्ठ का मार्गदर्शन
जब राजा दशरथ ने संकोच दिखाया, तब राजगुरु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया कि विश्वामित्र केवल एक ऋषि ही नहीं, बल्कि एक दिव्य योद्धा भी हैं और उनकी बात मानना आवश्यक है। इस पर दशरथ सहमत हुए और उन्होंने राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया।
राम और लक्ष्मण की यात्रा
राम और लक्ष्मण जब विश्वामित्र के साथ अयोध्या से प्रस्थान करते हैं, तो यह उनकी महान यात्रा की शुरुआत होती है। इस दौरान, महर्षि ने उन्हें शक्तिशाली मंत्रों—बाला और अतिबाला मंत्र—का उपदेश दिया, जिससे वे असीम शक्ति प्राप्त कर भूख और थकान से मुक्त रह सके। यह यात्रा भगवान राम के दिव्य कर्तव्य की पूर्ति का प्रथम चरण थी।