पुंडलीक की कथा महाराष्ट्र के पंढरपुर में शुरू होती है, लेकिन उनका प्रारंभिक जीवन आदर्श नहीं था। वह अपने माता-पिता की उपेक्षा करते थे और सांसारिक सुखों में लिप्त रहते थे। पुंडलीक के जीवन में बदलाव तब आया जब वह एक तीर्थयात्रा के लिए काशी गए।
काशी की यात्रा के दौरान पुंडलीक की मुलाकात ऋषि कुक्कुटस्वामी से हुई। उन्होंने पुंडलीक को माता-पिता की सेवा का महत्व सिखाया और बताया कि यह सबसे बड़ा धर्म है। ऋषि की बातें पुंडलीक के हृदय में गहराई से बैठ गईं, और जब वह घर लौटे, तो उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया। उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया और इसे ईश्वर की सेवा से बढ़कर माना।
भगवान विठ्ठल, पुंडलीक की भक्ति और सेवा से बहुत प्रभावित हुए और उनसे मिलने का निर्णय किया। भगवान विठ्ठल (जो भगवान कृष्ण के अवतार माने जाते हैं) पुंडलीक के घर के बाहर प्रकट हुए। उस समय पुंडलीक अपने माता-पिता की सेवा में लगे हुए थे। भगवान को देखकर भी पुंडलीक ने अपने माता-पिता की सेवा नहीं छोड़ी और एक ईंट बाहर फेंकते हुए भगवान से कहा कि वे उस पर खड़े हो जाएं, जब तक वह अपनी सेवा पूरी न कर लें।
भगवान विठ्ठल, पुंडलीक की भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि वह उसी ईंट पर खड़े रहे। जब पुंडलीक ने अपनी सेवा समाप्त की और बाहर आए, तो भगवान विठ्ठल को उसी स्थान पर खड़ा पाया। पुंडलीक ने भगवान के सामने अपना शीश झुकाया और उनकी भक्ति के प्रति भगवान विठ्ठल इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने पंढरपुर में रहने का निश्चय किया।
पुंडलीक की यह भक्ति कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की सच्ची पूजा और सेवा माता-पिता की सेवा में ही निहित है। यही कारण है कि पंढरपुर का मंदिर आज भी भक्तों का प्रमुख तीर्थ स्थल है, विशेषकर आषाढ़ी एकादशी के समय।
कथा की सीख:
पुंडलीक की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और ईश्वर की सेवा माता-पिता और प्रियजनों की सेवा में है। भगवान भी ऐसी निस्वार्थ भक्ति का सम्मान करते हैं।